तीन दिन तेंदुए के बीच – रोमांचक सत्य घटनांए – 1
Real Thrilling Incidents – Three Days Between Leopards
Written By : Utpal Mehta (ઉત્પલ મહેતા)
6th May, 2026

रोमांच, बारिश और मौत से सामना
प्रकृति, भय, रोमांच और जीवन के सबसे अविस्मरणीय अनुभवों की दास्तान
भुमिका …
नमस्कार मित्रों,
मैं मूलतः गुजराती भाषी हूँ। हिंदी बोलने का अवसर जीवन में थोडा-बहुत मिला, क्योंकि मेरा अधिकांश समय मुंबई में बीता और हिंदी फ़िल्मों, टीवी धारावाहिकों तथा हिंदीभाषी मित्रों के बीच रहना हुआ। परंतु किसी भाषा को बोलना और उसी भाषा में प्रभावशाली लेखन करना — दोनों अलग बातें हैं। हिंदी लेखन में मेरी सीमाएँ हैं, किंतु प्रकृति, जंगल और रोमांच के प्रति जो लगाव है, वह बिल्कुल अलग बात है, कह शकते है की यह मेरा एक पेशन है। सो यह अनुभव, में प्रमाणिकता के साथ यहां प्रस्तुत करने कोशिश रहा हूँ।
जब मैंने डिजिटल मैगज़ीन शुरू कीया, तब भाषा को लेकर कोई निश्चित योजना नहीं थी। लेकिन धीरे-धीरे महसूस हुआ कि ओर विषयों के साथ यदि प्रकृति और वन्यजीवन के ऐसे अनुभव केवल क्षेत्रीय भाषा तक रहे तो वह सीमित रह जाएँगे। भले ही मेरी हिंदी साहित्यिक न हो, पर यदि मेरी बात देश-विदेश के प्रकृति-प्रेमियों तक पहुँच शके, नई पीढ़ी को जंगल और प्रकृति के प्रति आकर्षित कर शके, तो यही, इस प्रयास की सबसे बड़ी सफलता होगी।
यह वह समय है की जब मनुष्य को फिर से प्रकृति की ओर लौटने की आवश्यकता है। जंगल, प्रकृति केवल रोमांच नहीं देते, वे भीतर की थकान को धोते हैं, मन को शांत करते हैं और जीवन को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह अनुभव सिध्ध स्टेट्मेंट है, जीस की चर्चा फीर कभी।
वन्यजीवन, एडवेंचर टूर और विशेष रूपसे गर्मीओं में हिमालय यात्राएँ — यह मेरा सबसे बड़ा शौक रहा है। हर यात्रा के बाद मैं स्वयं को भीतर से बदला हुआ महसूस करता हूँ। मेरे और मेरे जैसे ही लाइक माइन्डेड दोस्तों के कुछ रोमांचक – थ्रिलिंग अनुभव रहें है, मानता हुं पाठकों को यह जरूर पसंद आएगा, इन्हीं अनुभवों को अलग-अलग अध्यायों में आपके सामने रखने का यह प्रयास है। यह केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि प्रकृति के बीच जीए गए वास्तविक क्षणों का दस्तावेज़ है। हर यात्रा के बाद ऐसा लगता है मानो भीतर कोई नई शक्ति जन्म ले चुकी हो। जहां ह्म कुदरत के ज्यादा करीब पहुंचा हुआ महेसुस कर पाए.
इस श्रृंखला में वर्णित घटनाएँ पूर्णतः सत्य हैं। इनमें रोमांच अवश्य है, परंतु कहीं भी कल्पना का सहारा लेकर नाटकीय तत्व जोड़ने का प्रयास नहीं किया गया है। जो जैसा घटित हुआ, उसे उसी रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सामान्यत: प्रवास वर्णन आम विषय की अपेक्षा, विस्त्रुत होता है, वही उसकी मजा है।
यह कहानी नहीं है।
यह एक ऐसा अनुभव है, जहां खतरा, रोमांच, जंगल जिवनकी अनुभुति और भय एक ही रास्ते पर साथ-साथ चलते रहे है।
मेरे वे मित्र, जिनकी वजह से यह यात्रा संभव हुई ;-
मेरे कुछ आत्मिय मित्र वर्षों से इको-टूरिज़्म और वाइल्डलाइफ़ एडवेंचर से जुड़े हुए हैं। उनमें से एक हैं कर्णावती (अहमदाबाद) निवासी श्री मनिष वैद्य, और दूसरे हैं धरमपुर, वलसाड निवासी श्री परेश रावल, ग्रुप में जिन्हें सभी “पार्थ” नामसे ज्यादा जानते हैं।
मनीषभाई एज्युकेशन से वकील हैं, पर्यावरण विशेषग्य हैं, और देश की कई एडवाइजरी कमिटियों, रिज़र्व फ़ॉरेस्ट, सेंचुरी और नेशनल पार्क्स से जुड़े रहे हैं। प्रकृति के प्रति उनके गहरे प्रेम ने उन्हें पर्यटन को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बना ने प्रेरित किया। उनकी संस्था “लोरिस एसोसिएट्स” इको-टूरिज़्म क्षेत्र में विशेष कार्य करती है।
इसी प्रकार, वलसाड, धरमपुर स्थित मित्र पार्थ ने “नेचर डिस्कवरी” नाम से संस्था बनाई है, जिसके अंतर्गत अनेक प्रकृति एवं जंगल यात्राओं का आयोजन किया जाता है।
शुरुआत —
यह घटना वर्ष 2018 के मानसून की है।
मनीषभाई दक्षिण गुजरात में एक नए इको-टूरिज़्म स्पॉट की तलाश में थे। इसी सिलसिले में हमारे मित्र श्री योगेशभाइपाटील और राकेशभाइ पाटील ने हमें सोनगढ़ फ़ोर्ट आने आमंत्रित किया।

उनका “कैल्स” नामक होटल महाराष्ट्र बॉर्डर के नजदीक, एक शांत और घने जंगल से घिरे क्षेत्रके नजदिक में स्थित है। जिवनमें एक बार अवश्य मुलाकात करने योग्य स्थल है, मोनसुनमें “कैल्स” होटेल के सौंदर्य को शब्दो में वर्णीत कर पाना मुश्किल है .
यह इलाका साधारण जंगल नहीं है।
हम इस सर्च के अंतर्गत, दक्षिण गुजरात के सोनगढ फोर्ट के पास में स्थित, घने जंगल की ट्रीप पर निकले, जंगल का, बारिश के दौरान का माहोल मुश्किल ओर जोखिम भरा होता है ।
मनीषभाई अहमदाबाद से आ रहे थे। किसी कारणवश उन्हें देरी हो गई, इसलिए वडोदरा से निकलने में भी हमें दो-तीन घंटे देर हो गई।
हम शाम लगभग पाँच बजे मेरी मारुति कार से निकले। गुजरात के हाईवे, यदि सावधानी से ड्राइव किया जाए, तो किसी “लॉन्ग ड्राइव एक्सपीरियंस” से कम नहीं लगते।
हम दक्षिण गुजरात के घने जंगलों की ओर निकल पड़े।
कहो, जंगल हमें बुला रहा था…
हम बड़ौदा से शाम करीब पांच बजे निकले। गुजरात के लंबे हाईवे पर धीमी बारिश के बीच सफर किसी फिल्मी दृश्य जैसा लग रहा था। कहीं चाय, कहीं कॉफी, कहीं सड़क किनारे नाश्ता… बिना जल्दबाजी के सफर आगे बढ़ रहा था।
बरसात की मौसम में जंगल का वातावरण अत्यंत सुंदर होने के साथ-साथ खतरनाक भी होता है। कीचड़, फिसलन, अंधेरा, जंगली जानवर और अनिश्चित रास्ते — हर क्षण जोखिम से भरे होते हैं। में इस संदर्भ मे थोडा मूडी हुं, कहीं बार ऐसा हुआ है की सफर के दौरान अगर रास्ता जंगल से गुजरता हो तो में कार साइड मे खडी कर के कुछ देर वहीं बीता ने कोशिश करता हुं। कभी डर भी लगता है, उसे भगाने भी कोशिश करता हुं. मगर मुजे वह थ्रीलींग लगता है.

जो लोग केवल सुरक्षित और आरामदायक पर्यटन पसंद करते हैं, वे जंगल प्रवास से दूर रहे। सीर्फ होटेल “कैल्स” अनुभव भी काफी है. उसके आसपास का सौंदर्य भी आपको अदभुत कुदरती अनुभव महेसुस कराएगा. मित्र योगेशभाई पाटील और उनके छोटे भाई राकेश पाटील “कैल्स” को एक सुंदर होटल के रुप में सम्हाल रहे है। इतना दूरस्थ इलाका होने के बावजूद वहाँ रहने और भोजन की उत्तम व्यवस्था है। आसपास तेंदुओं का दिखाई देना वहाँ आम बात मानी जाती है। यही क्षेत्र के बिलकुल नजदिक से महाराष्ट्र सीमा की शुरुआत भी होती है। यहां से जंगल करीब 10 – 15 की.मी. की दुरी से शुरु होता है. जंगल में ही शबरीधाम, पम्पा सरोवर, यु – पोइंट, ग़ीरा फोल उस के जैसे और 10 – 12 वोटर फोल जैसे कहीं सारे प्रवासन स्थल से यह इलाका समृध्ध है,
हम वहाँ केवल घूमने नहीं, बल्कि जंगल के वास्तविक रोमांच, थ्रील को महसूस करने गए थे।
यह पूरा जंगल लोमड़ी, लकड़बग्घा, जंगल कैट, रस्टेड स्पॉटेड कैट, विविध हिरन, कुछ भालु और विशेष रूप से तेंदुओं के लिए प्रसिद्ध है।
आसपास का विशाल क्षेत्र गन्ने की खेतीसे भरा हुआ है, और इन्हीं खेतों में तेंदुए बरसात के मौसम में अपने बच्चों को जन्म देते हैं। जब तक शावक बड़े नहीं हो जाते, तब तक उनका अधिकांश समय वहीं बीतता है।
यानी… हम सीधे तेंदुओं की दुनिया में प्रवेश करने जा रहे थे।
हमारे लिए यह विचार ही रोमांचक था कि शायद इस यात्रा में तेंदुआ देखने मिल जाएँ।
राकेशभाई को हमने पहले से ही बता रखा था की हमें देर हो सकती है। उन्होंने होटल में हमारे डिनर की विशेष व्यवस्था भी कर दी थी, हालांकि हमने उनसे अनुरोध किया था कि वे हमारा इंतज़ार न करें।
ड्राइविंग का शौक होने के कारण अब स्टीयरिंग मनीषभाई ने संभाल ली थी।
लेकिन असली रोमांचक कहानी तब शुरू हुई…जब हम सुरत से पहले हाईवे छोड़कर लेफ्ट की ओर अंदरूनी जंगल वाले रास्ते की साईड मुड़े।
रात, जंगल और रास्ता भटक जाना...
अंदर के रास्ते पर मुड़ने के बाद, किसी गलत दिशा-निर्देश के कारण हम रास्ता भटक गए। हम लगातार अंदरूनी जंगल क्षेत्र में प्रवेश करते जा रहे थे।
रात का लगभग एक बज चुका था, चारों ओर घनघोर अंधेरा था।
रात… बारिश… और गलत रास्ता
रात गहराने लगी थी।
मोबाइल नेटवर्क कमजोर पड़ चुका था।
गूगल मैप भी जैसे जंगल के आगे हार मान चुका था।
सन्नाटा इतना गहरा था कि अपनी सांसों की आवाज भी भारी लगने लगी।
पूरे रास्ते में मुश्किल से आठ-दस वाहन दिखे होंगे। मानव बस्तियाँ भी अब लगभग गायब हो चुकी थीं। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि यदि रास्ता पूछना भी चाहें, तो किससे पूछें?
रास्ते में कभी लोमड़ी दिख जाती, कभी लकड़बग्घा, कभी जंगल कैट या हिरन। इन वन्य जीवों की अचानक झाड़ियों के बीच से झलक मिलती, तो भी रोमांच का अनुभव होता था।
लेकिन सबसे अधिक ध्यान खींच रहे थे तेंदुए की फोटो के साथ लगे वह बोर्ड, जो थोडी थोडी दूरी पर बार-बार दिखाई देते थे…
> “रात में वाहन से बाहर न निकलें, यह तेंदुए का क्षेत्र है, सावधान रहें।”
इन चेतावनियों ने वातावरण को अधिक रोमांचक और रहस्यमय बना दिया था।
हमें नहीं पता था कि कुछ देर बाद यही शब्द, शरीर में सिहरन बनकर दौड़ने वाले हैं।
वह झोंपड़ीयां… और तेंदुओं के बीच खड़ा मैं …
करीब डेढ़ बजे हमें दूर थोडे थोडे अंतर पर स्थित दो-तीन छोटी सी झोंपड़ीयों में हल्की रोशनी दिखाई दी।
मनीषभाई ने थोडी दुर रोड साइड कार रोकी और मैं रास्ता पूछने नीचे उतर गया। एक दो झोंपडी वालों ने पतरे के जो दरवाजे थे वह खटखटाने पर भी नहीं खोले, स्वाभाविक था रात डेढ़ बजे ऐसे जंगल विस्तार में कौन खोलेगा? किंतु, और एक झोंपडी का दरवाज़ा खटखटाने पर एक वृद्ध महिला बाहर आई, भीतर खाट पर आधे लेटे एक बुजुर्ग किसान बीड़ी पी रहे थे। उन्होंने अपनी भाषामें बताया कि हाईवे चार-पाँच किलोमीटर आगे है और एक छोटा रेस्टोरेंट भी मिलेगा। मुजे दो-तीन बार पुछना पडा, तब जा के समज में आया की वोह क्या कहे रहे है, लेकिन जाते-जाते उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—
> “इस समय यहाँ बाहर घूमना ठीक नहीं। तेंदुओं का इलाका है, तेंदुए घूमते हैं… दोबारा ऐसी गलती मत करना।”
उनकी बात सुनकर मैं सन्न रह गया, मेरे भीतर जैसे कुछ जम गया।
मैने पीछे मुडकर देखा, अचानक एहसास हुआ कि मैं कार से करीब सौ–डेढ़ सौ मीटर दूर आ चुका हूं।
दरवाजा बंद हो गया, मेरे बदन मे एक अनजान सी सीहरन एक क्षण के लिए फैल गइ,
चारों तरफ घना अंधेरा।
हल्की बारिश।
कातिल खामोशी।
और मैं…
तेंदुओं के इलाके के बीच अकेला खड़ा था।
उस क्षण जंगल का सन्नाटा “सामान्य” नहीं लग रहा था।
वह अजीब था।
डरावना था।
मानो कोई अदृश्य निगाहें मुझे देख रही हों।
तेंदुआ सिर्फ ताकतवर नहीं होता — वह बेहद चालाक, शातिर शिकारी होता है।
मुझे एहसास हुआ कि रास्ता पूछते-पूछते मैं कार से लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर दूर आ चुका था। कार ट्रायऐंगल पर सड़क की दूसरी ओर खड़ी थी और मनीषभाई मोबाइल में नेटवर्क खोजने में व्यस्त थे।
चारों ओर भयावह सन्नाटा था। हल्की बारिश हो रही थी। वातावरण में एक अजीब प्रकार की खामोशी थी — ऐसी, जिसे शब्दों में बयां करना कठिन है। वह जंगल की सामान्य शांति नहीं थी, उसमें किसी अदृश्य उपस्थिति का एहसास था।
तेंदुआ — जंगल का सबसे शातिर शिकारी, खतरनाक स्वभाव और उसकी शिकार करने की क्षमता
स्थानीय लोग तेंदुओं के व्यवहार से परिचित होते हैं। वे जानते हैं कि कहाँ सावधानी रखनी है और कैसे जीना है। लेकिन किसी अनजान व्यक्ति की एक छोटी सी गलती भी घातक साबित हो सकती है।
इस क्षेत्र में अक्सर ऐसे समाचार मिलते रहते है की…
“तेंदुए ने किसी पर हमला किया…”
“बच्चे को उठा ले गया…”
“रास्ते में शिकार कीया…”
रात को यहां शिकार हुआ,
वहां शिकार हुआ… वगैरा… वगैरा..
ऐसे न्युज वहाँ की हररोज की सामान्य वास्तविकता है।
दुर चमक रही रोड लाइट की हल्की सी रोशनी मे दिखाई पडी पेड़ की एक सूखी टहनी मेने हाथ में उठा ली, में जानता था की इस का कोइ मतलब नहीं है, यह कुत्ते का सामना करने की बात नहीं थी। मैं सोच रहा था कि यदि सामने तेंदुआ आ गया तो यह लकड़ी क्या कर पाएगी? दरअसल यह खुद की हिंमत को बनाए रखने का और जरुरत पडने पर “में लडाई के लिए तैयार हुं” वैसा खुद को तैयार करने का, सब- कोन्सीयस माईन्ड का सायकोलोजिकल ‘सेल्फ डीफेंस मिकेनिजम’ का एक तरीका हो ता है, मैं उसे स्ब-कोन्सियसली ‘फोलो’ कर रहा था
हाँ, यदि भाग्य साथ दे, तो तेज आवाज़ करना, हाथ हिलाना या किसी वस्तु को घुमाना शायद कुछ क्षण के लिए उसे रोक शके। लेकिन अंतिम निर्णय अक्सर भाग्य ही करता है।
तेंदुआ लगभग 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है। वह 9–10 फीट तक ऊँची छलांग और लगभग 18 फीट लंबी छलांग लगा सकता है — वह भी 100 से 125 के.जी. एकस्ट्रा वजन के साथ। उसकी जबड़ों की पकड़ अत्यंत शक्तिशाली मानी जाती है। ‘जॉ’ बाइटींग फोर्स 300 से 500 (पी.एस.आइ.) (पाउन्ड स्केवेर इन्च) तक आँकी जाती है। इसका अर्थ यह है कि एक बार यदि तेंदुआ अपने शिकार को जबड़ों में जकड़ ले, तो उससे बच निकलना लगभग असंभव हो जाता है। उसकी पकड़ अत्यंत सटीक और शक्तिशाली होती है।
वन्यजीव विशेषज्ञ तेंदुए को “ऑपर्च्युनिस्टिक हंटर” वीथ हाइ प्रीसिजन, अर्थात अवसर देखकर शिकार करने वाला शिकारी मानते हैं। यही बात उसे अन्य बड़े शिकारी जीवों से अलग बनाती है। उदाहरण के लिए, सिंह प्रायः सीधे और सामूहिक आक्रमण करने के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि तेंदुआ, शेर की तरह अत्यंत धैर्य और सूझबूझ से परिस्थितियों का निरीक्षण करता है।
वोह शिकार करने से पहले कई महत्वपूर्ण बातों का गहराई से आंकलन करता है।
वह पहले आसपास की परिस्थिति को समझता है,
फिर अपने और शिकार के बीच की दूरी का अनुमान लगाता है।
इसके बाद वह शिकार के वजन का मूल्यांकन करता है और यह भी सोचता है कि
शिकार को पकड़ने के बाद किस दिशा में भागना उसके लिए सबसे सुरक्षित और आसान रहेगा।
उसकी यह रणनीतिक सोच उसे जंगल का अत्यंत चतुर शिकारी बनाती है।
तेंदुए की हमला करने की शैली भी अत्यंत रहस्यमयी और खतरनाक होती है। वह कभी पेड़ों के पीछे छिपकर, कभी झाड़ियों में दुबककर, तो कभी पेड़ की ऊँची डाल पर बैठकर अचानक हमला कर सकता है। कई बार वह ऊपर से इतनी तेजी से छलांग लगाता है कि सामने वाले जीव को संभलने का अवसर तक नहीं मिलता। उसकी गति, सटीकता और अचानक हमला करने की क्षमता इंसान या कीसी भी जिव को प्रतिक्रिया देने का समय ही नहीं देती।
यही कारण है कि जंगल में शेर या तेंदुए की उपस्थिति मात्र से एक अदृश्य भय का वातावरण बना रहता है। वह केवल शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता, धैर्य, फुर्ती और रणनीतिक सोच से भी एक अत्यंत खतरनाक और शातिर शिकारी सिद्ध होता है। प्रकृति ने उसे ऐसा अद्भुत संतुलन दिया है, जिसमें ताकत, गति, धैर्य और बुद्धिमत्ता – सभी का भयानक संगम दिखाई देता है।
इस तरह वह सारी बातों का बखुबी जायजा लेता है, उसकी यह रणनीतिक सोच उसे जंगल का अत्यंत चतुर शिकारी बनाती है। जो वाकइ खतरनाक बात है ।
आखिरकार मंज़िल तक पहुँचना…
कमबख्त इसी समय यह सारे विचार उभरने लगे थे, मैं तेज़ी से वापस कार तक पहुँचा और बैठते ही दरवाज़ा बंद कर लिया, मानो इस वक्त मुजे कार का यह डोर, स्टील की दिवारसे भी ज्यादा मजबुत और सुरक्षित महसुस हुआ। पसिना पौछा, थोडी देर बाद मेरी सांस रिलेक्स हुइ,
उसके बाद मुजे यह प्रतित हुआ की मैं कैसा खतरा मोड कर आया था, अभी भी मुजे ऐसा लग रहा था की तेंदुआ कार की विन्डॉ के पास आकर दो पाउं से विन्डॉ के ग्लास के पास खडा हो जाएगा, मैंने वाकई विन्डॉ के ग्लास को चेक कीया, सब सलामत का एहेसास हुआ, फीर मुजे खुद के डर पर शर्म आई, और खुद को समजाया की एड्वेंच्रर्स ट्रीपमें डरना अलाउ नहीं होता, जोखिम का सामना करने की अगर तैयारी ना हो तो एड्वेंच्रर्स ट्रीप करनी ही नहीं चाहिए, मानो जैसे अंदर से एक जुनुन पैदा हुआ, अब मैं स्वस्थ था, जैसे लगा मेरी हिंमत बरकरार है, मगर अंदर से में कन्विन्स नहीं था, एक बेचेनी अंदर से मुजे जैसे जकड चुकी थी, मुजे बार बार अपने डर पर शर्म आ रही थी,
आखिर में स्वयं के डर को चैलेंन्ज करने कार का दरवाजा खोल कर फीरसे बाहर निकला, डॉर बंद किया, एक मिनिट खडा रहा, लंबी सांस ली, जब लगा की “हां अब डर का सामना करने तैयार हुं”, तब फीर डोर खोल कर अंदर बैठा। मनिषभाइ मोबाइल मे व्यस्त थे, मुजे पता था की स्वयं के अस्तित्व को बचाने इश्वरने दी यह सहज व्रुति है, डरना स्वाभाविक प्रक्रिया है, जंगल में एलर्ट रहेनेमे कोइ शर्म की बात नहीं है, मगर बात स्वयं के साथ के द्द्वंद पर आ चुकी थी, इन शोर्ट, अब में नोर्मल था.
कुछ देर बाद, हम उस छोटे रेस्टोरेंट तक पहुँचे। इसका डोर तेंदुए की वजह से बंद था, हमें देख कर उन्होंने वह खोला, यह उनके बताने पर ह्में पता चला, वहाँ के लोगों ने भी रात में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी।
डिनर के बाद सही दिशा-निर्देश लेकर हम आखिरकार रात लगभग तीन बजे अपने गंतव्य पर पहुँचे ।
लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी…
अगले दिन — जंगल के भीतर …
दूसरे दिन हमने अपनी कार वहीं छोड़ दी, और राकेशभाई की एस.यू.वी. में जंगल सफारी के लिए निकल पड़े।
हम कुल पाँच लोग थे।
जंगल सफर शुरू हुआ।
बारिश से भीगे रास्ते, गहरी खाइयां, झरने, फिसलन भरे पत्थर और घने पेड़ों के बीच से गुजरती हमारी एस.यू.वी. … सब कुछ किसी एडवेंचर फिल्म जैसा लग रहा था।
जंगल में कई स्थानों पर गहरी खाइयाँ थीं — कहीं 100 – 200 मीटर, तो कहीं 300 – 400 मीटर गहरी। चारों ओर घने पेड़, झाड़ियाँ और बारिश से भीगी मिट्टी।
इन्हीं खाइयों के बीच एक स्थान पर तीन स्तरों में गिरता हुआ अद्भुत, विशाल झरना था। वह दृश्य इतना मनमोहक था कि वहाँ से लौटने का मन ही नहीं करता था।
लेकिन जंगल सिर्फ सुंदर नहीं होता।
जैसे आगे बताया, वह उससे कहीं ज्यादा खतरनाक होता है।
मौत सिर्फ तेंदुए के रूप में नहीं होती…
रास्ते में एक छोटा-सा सांप दिखाई दिया। वनवासी ने तुरंत सबको सावधान किया—
वह था “रसल वाइपर”।
भारत के सबसे खतरनाक ‘साँपों’ में से एक। इसके काटने के बाद अगर सही समय पर उपचार ना कीया जाए तो महत्म दो–चार घंटे में मौत तय है।
यह साँप “हेमोटॉक्सिक” और “वास्कुलोटॉक्सिक” श्रेणी में आता है, जिसका प्रभाव शरीर के रक्तसंचार तंत्र और आंतरिक अंगों पर पड़ता है। वहीं कोबरा “न्यूरोटॉक्सिक” होता है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर असर डालता है।
जंगल में हर कदम सोच-समझकर, अती सावधानी से रखना पड़ता है। यहां गलती का दूसरा मौका नहीं मिलता। कीसी भी बात को नजर अंदाज नहीं करने की टेन्डन्सी, छोटी से छोटी बात के प्रति जाग़ृकता, आंख, कान और दिमाग की शार्पनेस, आसपास क्या हो रहा है, कैसी आवाज सुनाई दी, कैसी चहल पहल दिखी, हर बात, हर स्टेप में एलर्टनेस, हर कदम पर सावधानी, अँदरुनी समज, हिंमत ही आपके हथियार, ताकत और साथी होती है.
क्या खाना है ?
कहाँ पैर रखना है ?
किस पौधे को छूना है ?
कौन सा जूता या कपडा पहनना है ?
पहनते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए ?
स्थानीय जानकारी के बिना जंगल कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
मेरा ऑपरेशन वाला पैर… और अधूरी रही इच्छा…
बरसात जारी थी। वातावरण अद्भुत था। हर क्षण ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं कोई रहस्य छिपाए बैठी हो।
लेकिन मेरी एक समस्या थी।
साल 2015 में पेड़ से गिरने के कारण मेरे बाएँ पैर में फ्रैक्चर हुआ था। ऑपरेशन के बाद स्टील प्लेट डाली गई थी, जो अभी तक निकाली नहीं थी। इसी कारण तेज़ चलने या दौड़ने में मुझे परेशानी होती थी।
आधे रास्ते पहुँचने पर एक स्थानीय वनवासी ने मेरे पैर को देखकर मुझे नीचे खाई में आगे जाने से रोक दिया।
उसने कहा—
> “यदि तेंदुए के कारण, अचानक तुरंत लौटना पडे, तो आपके लिए मुश्किल हो जाएगा।”
उसकी बात सही थी।
मन तो झरने तक जाने का था, मगर मजबूरी में मुझे वापस लौटना पड़ा।
बाकी सब लोग नीचे झरने की और एक साथ आगे बढे। शेर, भालु या तेंदुओं वाले क्षेत्रों में समूह में रहना सुरक्षित माना जाता है। जब की हाथी एक ही ऐसा जीव है, जीसे आप समुहमें हो या अकेले कोइ फर्क नहीं पडता, अगर एक बार वह ठ।न ले, तो बात खत्म ।
नीचे उतरने मेरी अदम्य इच्छा थी, क्योंकि कभी पहाड़ चढ़ना-उतरना मेरे लिए सामान्य बात थी। लेकिन परिस्थिति समझदारी माँग रही थी।
सो तेंदुए और फिसलन की वजह से एक लोकल वनवासी के साथ मुजे वापिस भेजा गया,
वापस लौटते समय मैंने तय कर लिया—
अब वडोदरा लौटकर सबसे पहला काम यही होगा कि पैर की प्लेट निकलवाइ जाए।
ताकि अगली बार इसी बारिश में लौटकर उस झरने तक अवश्य उतर शकु।
(हालाँकि बाद में जीवन की व्यस्तताओं और फिर कोरोना काल के कारण वह आज तक संभव नहीं हो पाया।)
बारिश से भीगी उस कच्ची जंगल-पगडंडी पर चलते हुए ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति स्वयं अपने अनगिनत जीवों के साथ किसी उत्सव में शामिल हो गई हो। चारों ओर नमी की सौंधी सुगंध फैली थी और रास्ते पर असंख्य छोटे-छोटे केकड़े अपने बिलों से बाहर निकल आए थे। वे चींटी की तरह किसी अनुशासित सेना की तरह नहीं, बल्कि मुक्त जीवों की भाँति इधर-उधर विचरण कर रहे थे, मानो वर्षा की ठंडी फुहारों का आनंद लेने प्रकृति की गोद में निकल पड़े हों। पाउं पर ना चड जाए, इतना संम्हाल कर चलना पडता था।
मेरे साथ चल रहे वनवासी साथी ने मुस्कुराते हुए कहा कि वर्षा ऋतु में केकड़ों का यह बर्ताव सामान्य है। उसने मुजे उनकी प्रकृति समझाने के लिए एक मध्यम साइज के केकड़े को सावधानी से उठाया और उसके पैरों को हल्के से कुछ क्षण वैसे ही पकड रखा। प्रारम्भ में वह जीव शांत दिखाई दिया, किंतु जैसे ही उसे पुनः धरती पर छोड़ा गया, उसके व्यवहार में अजीब परिवर्तन देखने को मिला।
अब वह सामान्य ढंग से नहीं चल रहा था। उसके भीतर मानो प्रतिरोध और क्रोध की ज्वाला भड़क उठी हो। वह अस्वाभाविक तिरछी चाल में तीव्र गति से उसी वनवासी की ओर बढ़ने लगा, जिसने उसे पकड़ा था। वह दृश्य अत्यंत आश्चर्यजनक था। मात्र दो-तीन इंच का वह नन्हा जीव भी अपने आत्मसम्मान और साहस का परिचय दे रहा था। उसकी छोटी-सी देह में छिपी निर्भीकता देखकर में स्तब्ध रह गया।
वनवासी ने उसे अपनी एक उंगली से हल्के से दूर किया, किंतु इससे उसका आक्रोश और बढ़ गया। वह पुनः उसी चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में आगे बढ़ने लगा। उस क्षण यह अनुभव हुआ कि जंगल का प्रत्येक जीव, चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करना ना सीर्फ जानता है किंतु यह उसका एक कुदरती स्वभाव होता है, उसके लिए मौत से भीडना वह प्राक्रुतिक है, यहां जिंदा रहने का दुसरा नाम है मौत को लगातार चुनौति देते रहेना।
वनवासी ने आगे बताया कि इस क्षेत्र के कुछ लोगों के लिए यही केकड़े भोजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। वे इन्हें पकड़कर आग पर भून लेते हैं और खा जाते हैं। जंगल का जीवन प्रकृति के साथ सीधे जुड़ा हुआ है, जहाँ जीविका और पर्यावरण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहते हैं।
उस दृश्य को देखकर अचानक प्रसिद्ध साहसिक कार्यक्रम ‘मेन वर्सेस वाइल्ड’ और उसके निर्भीक प्रस्तोता Bear Grylls की याद ताज़ा हो आई। यहां भी जंगल, उसके जीव, उनका संघर्ष और मनुष्य का उनसे संबंध — यह सब कुछ उसी रोमांचकारी जिवनशैली का जीवंत अनुभव प्रतीत हो रहा था।
बारिश चालु थी, ह्म पुरी तरह भीग चुके थे, अच्छे बच्चे की तरह, में फ्रेकचर वाला पाउं और बारिश की वजह से, अफसोस के साथ, भीगा हुआ, उसकी झोंपडी में जा बैठा, ऊसने मेरी पानी से लथबथ, ओर ठंडी हवा से कंप रही हालात को देख कर, गरम गरम गुड की चाय पीलाई, उस वक्त वह चाय किसी आशीर्वाद से कम नहीं थी।
करीब दो घंटे बाद सब वापिस लौटे, हमारी सफर आगे बढी, घुमते घुमते शाम कब हो गइ पता ही नहीं चला, कभी लोमडी देखी, कभी हिरन, कभी हायना यानी, लकडबग़्घा देखा।
शाम को लौटते समय कहीं सारे अलग अलग स्पोट विजीट किए, सन लाइट के बदलते एंगल के साथ जंगल का माहोल भी अजीब करवट बदलता महेसूस होता था, शाम के समय, एक जगह, रास्ते की बाजु की चट्टान से गीर रहा एक वोटरफोल तीन अलग कलर शेड्स में दिखाइ पडा, – जमीन से नजदिक अलग, – व्हीकल की लाइट के शेडो से मध्य में अलग और – चट्टान की चोटी के नजदिक हल्की सी सन लाइट की रोशनी की वजह से अलग, ऐसा नजारा ना जिवन में पहले कभी देखा था, ना ही कल्पना हो पाइ थी, ‘ईश्वर का कमाल है’ बस, बार बार यह एक ही ‘शब्द’ के अलावा हमें यह अद्दभुत नजारा व्यक्त करने और कोइ लब्ज पर्याप्त नहीं लग रहा था। कुछ वनवासी लोग और बच्चे उस वोटरफोल के नीचे स्नान की मजा ले रहे थे। हम सब ने भी पानी की बौछार में थोडी देर हाथ पाउं मार लीए। ओर वैसे ही भीगे हुए सब कार में बैठ गए।
तीन दिनों तक हमने कई जंगल स्पॉट देखे।
कहीं धुंध पेड़ों को निगल रही थी।
कहीं बारिश चट्टानों पर संगीत बजा रही थी।
कहीं झरनों पर पड़ती सूरज की किरणें कइ अलग रंगों में चमक रही थीं।
मैंने जिंदगी में पहली बार देखा कि एक ही झरना इतने रंगों में भी दिखाई दे सकता है।
उस क्षण बस एक ही शब्द मन में आ रहा था—
> “ईश्वर का कमाल…”
ऐसा दृश्य मैंने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था।
जंगल के वे रंग… जिन्हें शब्दों में बाँधना कठिन है
इस प्रवास के दौरान हमने कई अद्भुत स्थान देखे।
दो दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला…
राकेशभाई का आत्मीय व्यवहार, जंगल के प्रति उनका उत्साह, और हर जगह हमें सुरक्षित रखते हुए प्रकृति का अनुभव कराने का उनका तरीका — यह सब हमारे लिए सौभाग्य जैसा था।
दिन जंगल में बीतते थे और रात होटल लौटते थे, हमारी इच्छा थी की एक रात जंगल में बिता शके, किंतु वह हो नही पाया।
देखते ही देखते दो दिन गुजर गए।
स्वयं के साथ का वह द्वँद, वह भयावह जंगल, वह बारिश, वह रहस्यमय वातावरण, और हर क्षण छिपी हुइ थ्रील — यह सब मेरे जीवन की सबसे अविस्मरणीय स्मृतियों में शामिल हो चुका था।
बस एक अफसोस रह गया था—
तेंदुओं से भरे क्षेत्र में आने के बावजूद भी हमें एक भी तेंदुआ दिखाई नहीं दिया।
लेकिन शायद प्रकृति ने मेरी बात सुन ली थी…
क्योंकि तीसरे ही दिन मुझे तेंदुए से जुड़ा ऐसा भयावह अनुभव हुआ, जहाँ मैं सचमुच मौत के बेहद करीब पहुँच गया था।
यदि कहूँ कि मैं मरते-मरते बचा — तो वह अतिशयोक्ति नहीं होगी।
लेकिन वह कहानी… अगले अध्याय में।
आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान होगी। उससे मुझे यह समझने में सहायता मिलेगी कि लेखन को और अधिक प्रभावशाली, पठनीय और रोचक कैसे बनाया जा सकता है।
धन्यवाद।
उत्पल मेहता
Vadodara
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