वडोदरा स्थित एक उमदा एवं उदार व्यक्तित्व — “अरहम ऑर्गेनिक स्टोर” के संस्थापक श्री धिरेनभाई मेहता
Written By : Utpal Mehta 10th May, 2026 मित्रों, “बहु रत्ना वसुंधरा” — यह मेरे डिजिटल मैगज़ीन और यूट्यूब पर प्रसारित “उत्पल मेहता टॉक-शो” में प्रयुक्त होने वाला एक ऐसा वाक्यांश है, जो संभवतः मेरे पाठकों और दर्शकों को बार-बार दोहराया हुआ प्रतीत होता होगा। किंतु यह कोई असंगत पुनरावृत्ति नहीं है। जब भी मैं किसी व्यक्तित्व का उचित मूल्यांकन करने का प्रयास करता हूँ, तब मुझे यही एक वाक्य ऐसा प्रतीत होता है जो उस व्यक्तित्व के साथ सर्वाधिक न्याय कर सकता है। इसलिए मैं इस अभिव्यक्ति के प्रयोग किए बिना स्वयं को रोक नहीं पाता। आज मैं इस पत्रिका के “अचीवर्स” विभाग में ऐसे ही एक व्यक्तित्व का परिचय देने का प्रयास कर रहा हूँ, जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि कलियुग में, जब अधिकांश लोग प्रत्येक कदम पर केवल अपने स्वार्थ और लाभ की चिंता करते हैं, जब संवेदनहीनता मानो सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है, ऐसे समय में भी यदि कोई व्यक्ति विशाल हृदय और मानवीय संवेदनाओं के साथ जीवित है, तो वह यह प्रमाणित करता है कि “पृथ्वी अभी रसातल में नहीं गई है।” मैंने यहाँ किसी स्वार्थवश प्रशंसा नहीं की है; केवल वही प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जो मुझे सत्य और उचित प्रतीत हुआ। धिरेनभाई मेहता मूलतः कच्छ-भुज के निवासी हैं। वर्षों पूर्व वे वडोदरा में स्थायी रूप से बसे, संघर्ष किया और सफलता प्राप्त की। उन्होंने जीवन की कठिन परिस्थितियों, मनुष्य की विवशता, उसकी दुर्बलता, सामर्थ्य और सामाजिक वास्तविकताओं को निकट से देखा है। उनका विकास वास्तविक अर्थों में परिश्रम पर आधारित है। वे एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक्स, अनुसंधान एवं विकास (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) तथा स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं और इन क्षेत्रों का व्यापक अनुभव रखते हैं। उनके व्यक्तित्व की एक अत्यंत प्रेरणादायी विशेषता यह है कि वे कभी किसी की कमी या दुर्बलता को देखकर उसकी आलोचना नहीं करते, बल्कि उसमें निहित अच्छाइयों को ग्रहण करने का प्रयास करते हैं। यह गुण वास्तव में प्रशंसनीय है, और उनके सभी लोगों के साथ आत्मीय संबंधों को देखकर सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि उन्होंने इस विचार को अपने जीवन में आत्मसात किया है। यदि कोई व्यक्ति अपनी किसी समस्या को लेकर उनके पास पहुँचता है, तो शायद ही ऐसा होता हो कि वे उसे टाल दें। जहाँ तक संभव हो, उनका पहला विचार यही होता है कि “यह व्यक्ति आवश्यकता या संकट में है, तो मैं इसकी क्या सहायता कर सकता हूँ?” कोरोना महामारी के अत्यंत कठिन समय में उनके मन में जैन मुनियों और साध्वियों के प्रति सेवा की भावना जागृत हुई। यदि किसी साधु-साध्वी का स्वास्थ्य बिगड़ता या उन्हें कोई शारीरिक कष्ट होता, तो उनके लिए कुछ करने की प्रेरणा उन्हें भीतर से प्राप्त होती थी। उस सेवा में केवल निस्वार्थ भावना थी, कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं। इसी कालखंड में, जब जैन साधु-साध्वियों तक उचित खाद्य सामग्री या प्राकृतिक औषधीय वस्तुएँ पहुँचाने की आवश्यकता पड़ी, तब उन्हें यह अनुभव हुआ कि रासायनिक खाद से उत्पन्न खाद्य पदार्थों की अपेक्षा यदि जैविक खेती से उत्पादित अनाज, मसाले एवं अन्य खाद्य सामग्री का उपयोग किया जाए, तो शरीर का स्वास्थ्य अधिक स्वाभाविक रूप से सुरक्षित रह सकता है। इससे शरीर में रासायनिक विषाक्तता कम पहुँचती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है। तभी उन्होंने इस विचार को व्यवहार में उतारने का निश्चय किया। वास्तविक प्रश्न यह था कि उच्च गुणवत्ता वाली खाद्य सामग्री प्राप्त कैसे की जाए? उनके स्वभाव के अनुरूप यह उनके शोध का विषय बन गया कि किस क्षेत्र, किस प्रदेश अथवा किस स्थान से सर्वोत्तम गुणवत्ता की मूल एवं शुद्ध सामग्री प्राप्त की जा सकती है। उनका मानना है कि जिस क्षेत्र की जो मूल सामग्री होती है, वहीं से उसे मँगाने पर उसकी वास्तविक गुणवत्ता बनी रहती है। कोरोना काल के दौरान उन्होंने इस क्षेत्र में अत्यंत गंभीर शोध की और उल्लेखनीय कार्य किया — यह निस्संदेह कहा जा सकता है। कोरोना के पश्चात उनके मन में विचार आया कि यदि इतनी मेहनत और अनुसंधान के बाद इतना ज्ञान प्राप्त हुआ है, तो उसे केवल स्वयं तक सीमित क्यों रखा जाए? समाज के व्यापक हित में उसका उपयोग क्यों न किया जाए? इसी विचार से वडोदरा के अकोटा क्षेत्र में, सयाजी हॉल के समीप स्थित अरहम ‘ऑर्गेनिक स्टोर’ का जन्म हुआ। आज यह प्रतिष्ठान अत्यंत सम्मानित एवं विश्वसनीय ‘ऑर्गेनिक स्टोर’ के रूप में स्थापित हो चुका है, जहाँ लगभग एक हजार से अधिक प्रकार की विभिन्न प्रदेशों की मूल एवं शुद्ध खाद्य सामग्री उपलब्ध है। उनका कहना है कि सामान्यतः हल्दी में लगभग 2% से 4% तक करक्यूमिन पाया जाता है, किंतु यदि किसी विशेष क्षेत्र की उच्च गुणवत्ता वाली हल्दी का उपयोग किया जाए, तो उसमें 7% से 10% तक करक्यूमिन प्राप्त हो सकता है, जो अनेक रोगों में अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है। आंत्र संबंधी रोगों सहित कई बीमारियों में अमेरिका जैसे देशों में भी हल्दी और पारंपरिक औषधियों का महत्व पुनः बढ़ रहा है। अब चिकित्सक भी उच्च गुणवत्ता वाली हल्दी के उपयोग की सलाह देने लगे हैं। भारत आयुर्वेद की मूल भूमि है। यदि इस क्षेत्र में और अधिक गंभीर शोध किए जाएँ तथा सरकार प्रोत्साहनात्मक नीतियाँ लागू करे, तो भविष्य में और भी बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। वे यह भी कहते हैं कि जब उच्च गुणवत्ता वाली हल्दी को अत्यंत शुद्ध देशी गाय के घी के साथ मिलाकर (इन्फ्यूज़ करके) दिया जाता है, तब उसके सकारात्मक परिणाम अधिक स्पष्ट रूप से देखने को मिलते हैं। हालाँकि वे ईमानदारी से यह भी स्वीकार करते हैं कि स्वास्थ्य केवल एक उपाय पर निर्भर नहीं करता; प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। फिर भी हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा प्रदान किया गया जो पारंपरिक ज्ञान हमें विरासत में मिला है, यदि हम वास्तव में उत्तम स्वास्थ्य चाहते हैं, तो उसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि समाज रसायन-मुक्त भोजन की ओर अग्रसर हो, तो स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार संभव है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सकती है, बचपन से ही शरीर का संतुलित विकास हो सकता है, और उसके सकारात्मक मानसिक एवं


